योगदर्शन की परंपरा

yog

योगदर्शन भारतीय दर्शनशास्त्र की एक अत्यंत प्राचीन शाखा है | योग को व्यवस्थित रूप देने का श्रेय पतंजलि को है | परंतु इससे भी विश्रृंखलित रूप से वेदों, उपनिषदों, सूत्रों आदि में “योगदर्शन” की विशेषताएं मिलती है | ऋग्वेद में कई स्थलों पर यौगिक प्रक्रिया का उल्लेख है | उपनिषदों में तो “योग की प्रक्रिया” के बहुत से प्रमाण उपलब्ध है | कठोपनिषद में योग का लक्षण इस प्रकार किया गया है – तां योगागमिति मन्यते स्थिरामांद्रियधरणाम अर्थात स्थिर इंद्रियाधार को योग कहते है |

श्वेताश्वतरोपनिषद में क्रियात्मक योग का बहुत सुन्दर वर्णन किया गया है – समाधी करते समय सिर, गर्दन और रीड को एक सीध में रखना, इन्द्रियो को मन के द्वारा वश में करना, श्वास – प्रश्वास का नियमन, समतल, पवित्र मनोनुकूल स्थान पर योग का अभ्यास करना आदि विधान यहाँ बताये गए है | छान्दोग्योपनिषद, वृहदारन्यकोपानिषद और कौषीतकि उपनिषद में ह्रदय से पूरीरत तक जाने वाली नाड़ियो का वर्णन है | उपनिषदों के बाद पुराणों में “योग” का विस्तार से वर्णन मिलता है |

वास्तव में प्राचीन ऋषियो की अंत दृष्टि का कारन भी योग ही था | तभी सदा से दार्शनिको और धर्म प्रचारको ने “योग” की प्रकृष्ट उपयोगिता मानी है तथा उसका विवेचन अपने – अपने दृष्टिकोण से किया है | इसलिए “योग” के अनेक प्रकार है | बुद्ध धर्म के पालीत्रिपिटकों तथा संस्कृत ग्रंथो में भी योग का विवेचन पर्याप्त मात्रा में मिलता है | महावीर स्वामी स्वयं योगी थे और जैनधर्म में योग का विवेचन विशिष्टता से हुआ है | तंत्रो में तो योग का महत्वपूर्ण स्थान है ही | गोरखनाथ के “नाथ संप्रदाय” में योग का इतना आदर है की उस संप्रदाय को “योगी संप्रदाय” के नाम से पुकारते है | नाथपंथी सिद्ध “हठयोग” के परमाचार्य मने गए है | मंत्रयोग, लययोग आदि प्रसिद्ध ही है | परंतु “योगदर्शन” पतंजलि का दर्शन है, जिसे “राजयोग” की संज्ञा मिली है |

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